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Friday, May 2, 2014

अक्षय तृतीया



अक्षय तृतीया बैशाख माह की शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है ,क्यों ,इस विषय में सभी लोग अलग-अलग कारण बताते हैं ,पर इसका जो वास्तविक  अर्थ है वह है कभी क्षीर्ण न होने वाला ,और इसका तृतीया शब्द संस्कृत भाषा से लिया गया है ,जिसका अर्थ है तीसरा ,और चन्द्र पंचांग के अनुसार इसका अनुमान लगाया जाता है। पौराणिक मान्यताओं में कहा गया है कि इस दिन शुरू किये गये कार्यों में अधिक से अधिक सफलता मिलने के संकेत मिलते है। इस महालक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिये विशेष अनुष्ठान किये जाते हैं ,इस दिन पंचांग देखे बिना ही कोई भी कार्य किया ज सकता है। इस दिन समस्त शुभ कार्य जैसे विवाह,गृह -प्रवेश ,पदभार,स्थान-परिवर्तन और स्वर्ण खरीदने जैसे कार्य किये जाते हैं भविष्य पुराण के अनुसार इस दिन सतयुग और त्रेता युग का आरम्भ हुआ था ,भगवान विष्णु के २४ अवतारों में से परशुराम,नर-नारायण तथा हयग्रीव ने अवतार लिया था। आज से ही बद्रीनाथ की  पट भी खुलते हैं। 

जब मीडिया का इतना प्रचार नही था तब भि अक्षय तृतीया मनाई जाती थी पर अब अखबारों  मेँ और टेलीविजन पर इतना प्रचार हो जाने के कारण सारे पर्व मनाने के लिये उत्साह अलग ही देखा जाता है। 

Monday, April 21, 2014

वरूथनी एकादशी व्रत महत्व ,पूजा,विधि



                                                                                                                                                                    वरूथनी एकादशी का व्रत बैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को किया जाता है ,पाण्डु पुत्र युधिष्ठिर ने जब श्रीकृष्ण से पुछा-" कि बैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को क्या कहते हैं" ,तब श्रीकृष्ण जी ने बताया कि इस एकादशी को बरूथनी एकादशी के नाम से जाना जाता है  । 

महत्व -------

कहा जाता है -जो मनुष्य इस एकादशी को पूर्ण श्रद्धा से इस व्रत को करते हैं उन्हें दस हजार वर्ष तप करने से जो फल मिलता है वो ही इस व्रत के प्रभाव से मिलता है ,कन्या दान से भी उत्तम इस व्रत का फल है ,जो फल कुरुक्षेत्र में स्नान से मिलता है वो ही इस व्रत के प्रभाव से मिलता है। 


व्रत की विधि-------


इस एकादशी के व्रत के के दिन पूर्व यानि की दशमी को रात्रि में सात्विक भोजन करना चाहिए साथ ही शयन के लिए धरती का उपयोग करना चाहिए ,व्रती को प्रातः स्नान से निवृत होकर पूजन सामिग्री एकत्रित करने के उपरांत धूप ,डीप और धान्य से पूजन करना चाहिए । 

कथा ----


प्राचीन समय में नर्मदा नदी के तट पर  राजा मान्धाता राज्य सुख को भोग रहे थे ,राजयकाज करते हुए भी राजन अत्यधिक दानशील और तपस्वी थे , एक दिन जब राजन तपस्या में लीं थे उसी समय एक जंगली भालू ने राजा का पैर काटना शुरू कर दिया और थोड़ी ही देर में वह राजा को जंगल में ले गया ,राजा घर गए और उन्होंने भगवान विष्णु की आराधना की और शीघ्र ही श्री विष्णु वहां प्रकट हो गए, और उन्होंने अपने चक्र से उस भालू को मार गिराया ,पर तब तक भालू उनका पैर तो खा ही चूका था जिसके कारण राजा बहुत चिंतित हुए।
भगवान वुशनु जी ने कहा तुम मथुरा में जाकर मेरी वराह अवतार की पूजा करो और वरूथनी एकादशी का व्रत करो। राजन ने पूर्ण शर्द्धा से इस व्रत को किया और वो पहले जैसे सुन्दर अंगों वाले हो गए । 


Monday, April 14, 2014

हनुमान जयन्ती /hanuman jayanti /मंगल को जन्मे मंगल करने वाले जय वीर हनुमान



हिन्दू पंचांग के अनुसार हनुमान जयंती प्रतिवर्ष चैत्र माह की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है. मान्यता है कि इसी पावन दिवस को भगवान राम की सेवा करने के उद्येश्य से भगवान शंकर के ग्यारहवें रूद्र ने वानरराज केसरी और अंजना के घर पुत्र रूप में जन्म लिया था. यह त्यौहार पूरे भारतवर्ष में श्रद्धा व उल्लास के साथ मनाई जाती है. 

रामायण के अनुसार वे जानकी के अत्यधिक प्रिय हैं. इस धरा पर जिन सात मनीषियों को अमरत्व का वरदान प्राप्त है, उनमें बजरंगबली भी हैं. हनुमानजी का अवतार भगवान राम की सहायता के लिये हुआ. हनुमानजी के पराक्रम की असंख्य गाथाएं प्रचलित हैं.

वर्ष 2015 में हनुमान जयंती दिनांक 4 अप्रैल दिन शनिवार को पड़ रही है। 

हनुमान जी की उपासना का मन्त्र यह है -------

                    अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं                            दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् .                    सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं                             रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि..                    दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे च जनकात्मजा.                             पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनन्दनम् ..

इस मन्त्र का अर्थ इस प्रकार है ---------

   अतुल बल के धाम ,सोने के पर्वत (सुमेरु )के समान कांतियुक्त शरीर वाले , दैत्यरूपी वन (को ध्वंश करने ) के लिए अग्निरूप ,ज्ञानियों में अग्रगण्य ,सम्पूर्ण गुणों के निधान, वानरों के स्वामी ,श्रीरघुनाथजी के प्रिय भक्त पवनपुत्र श्री हनुमान को मैं प्रणाम करता हूँ ॥ जिनके दायीं ओर लक्ष्मण और बायीं ओर जानकी जी और साथ में हनुमान जी विराजमान हैं, उन रघुनाथजी की मैं वंदना करता हूँ ॥ 

दोहा -------

श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि.बरनऊँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार.बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥

दोहे का अर्थ इस तरह से है -------

श्रीगुरुजी के चरणकमलों की राज से अपने मन रुपी दर्पण को साफ़ करके मैं श्री रघुनाथजी के उस निर्मल यश का वर्णन करता हूँ ,जो चारों फलों को ( धर्म ,काम,अर्थ,मोक्ष ) को देने वाला है ॥
क्तों की मन्नत पूर्ण करनेवाले पवनपुत्र हनुमान के जन्मोत्सव पर इनकी पूजा का बड़ा महातम्य होता है. आस्थावान भक्तों का मानना है कि यदि कोई श्रद्धापूर्वक केसरीनंदन की पूजा करता है तो प्रभु उसके सभी अनिष्टों को दूर कर देते हैं और उसे सब प्रकार से सुख, समृद्धि और एश्वर्य प्रदान करते हैं. इस दिन हनुमानजी की पूजा में तेल और लाल सिंदूर चढ़ाने का विधान है. हनुमान जयंती पर कई जगह श्रद्धालुओं द्वारा झांकियां निकाली जाती है, जिसमें उनके जीवन चरित्र का नाटकीय प्रारूप प्रस्तुत किया जाता है. यदि कोई इस दिन हनुमानजी की पूजा करता है तो वह शनि के प्रकोप से बचा रहता है.

श्री हनुमान चालीसा ----

Hanuman
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर, जय कपीस तिंहु लोक उजागर |
रामदूत अतुलित बल धामा अंजनि पुत्र पवन सुत नामा ||
महाबीर बिक्रम बजरंगी कुमति निवार सुमति के संगी |
कंचन बरन बिराज सुबेसा, कान्हन कुण्डल कुंचित केसा ||
हाथ ब्रज औ ध्वजा विराजे कान्धे मूंज जनेऊ साजे |
शंकर सुवन केसरी नन्दन तेज प्रताप महा जग बन्दन ||
विद्यावान गुनी अति चातुर राम काज करिबे को आतुर |
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया रामलखन सीता मन बसिया ||
सूक्ष्म रूप धरि सियंहि दिखावा बिकट रूप धरि लंक जरावा |
भीम रूप धरि असुर संहारे रामचन्द्र के काज सवारे ||
लाये सजीवन लखन जियाये श्री रघुबीर हरषि उर लाये |
रघुपति कीन्हि बहुत बड़ाई तुम मम प्रिय भरत सम भाई ||
सहस बदन तुम्हरो जस गावें अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावें |
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा नारद सारद सहित अहीसा ||
जम कुबेर दिगपाल कहाँ ते कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते |
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा राम मिलाय राज पद दीन्हा ||
तुम्हरो मन्त्र विभीषन माना लंकेश्वर भये सब जग जाना |
जुग सहस्र जोजन पर भानु लील्यो ताहि मधुर फल जानु ||
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख मांहि जलधि लाँघ गये अचरज नाहिं |
दुर्गम काज जगत के जेते सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ||
राम दुवारे तुम रखवारे होत न आज्ञा बिनु पैसारे |
सब सुख लहे तुम्हारी सरना तुम रक्षक काहें को डरना ||
आपन तेज सम्हारो आपे तीनों लोक हाँक ते काँपे |
भूत पिशाच निकट नहीं आवें महाबीर जब नाम सुनावें ||
नासे रोग हरे सब पीरा जपत निरंतर हनुमत बीरा |
संकट ते हनुमान छुड़ावें मन क्रम बचन ध्यान जो लावें ||
सब पर राम तपस्वी राजा तिनके काज सकल तुम साजा |
और मनोरथ जो कोई लावे सोई अमित जीवन फल पावे ||
चारों जुग परताप तुम्हारा है परसिद्ध जगत उजियारा |
राम रसायन तुम्हरे पासा सदा रहो रघुपति के दासा ||
तुम्हरे भजन राम को पावें जनम जनम के दुख बिसरावें |
अन्त काल रघुबर पुर जाई जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई ||
और देवता चित्त न धरई हनुमत सेई सर्व सुख करई |
संकट कटे मिटे सब पीरा जपत निरन्तर हनुमत बलबीरा ||
जय जय जय हनुमान गोसाईं कृपा करो गुरुदेव की नाईं |
जो सत बार पाठ कर कोई छूटई बन्दि महासुख होई ||
जो यह पाठ पढे हनुमान चालीसा होय सिद्धि साखी गौरीसा |
तुलसीदास सदा हरि चेरा कीजै नाथ हृदय मँह डेरा ||









































                     दोहा ----- पवन तनय संकट हरन मंगल मूरति रूप |


                                                           राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप ||

      आप सभी को हनुमान जयंती की बहुत-बहतु शुभकामनाएं ,,,,,,जय श्री राम 

Thursday, March 27, 2014

navratri shubhaarmbh /नवरात्री का शुभारम्भ 31 march 2014

दोस्तों ,इस वर्ष नवरात्री का शुभारम्भ दिनांक ३१ मार्च २०१४ को हो रहा है ,और हर वर्ष की भांति हम सभी अपने मंदिर में पूजन करने के लिए जाने की तैयारी में लग गए हैं.
फिर मैंने सोचा जाने से पूूर्व आप सभी के साथ नवरात्री की पूजा की विस्तृत जानकारी शेयर कर लूँ ,

नवबर्ष का आरंभ ------

भारतीय शास्त्र के अनुसार चैत्र मास    के शुक्ल पक्ष से नव वर्ष का आरम्भ होता है .ऐसा माना जाता है की इसी दिन ब्रह्मा जी ने स्रष्टि का सृजन किया था .कुछ लोग ऐसा मानते हैं की भारत के प्रतापी राजा चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के संवत्सर का आरंभ भी इसी दिन से किया  था ,अतः इस दिन का दोनों ही द्रष्टि से बहुत महत्त्व है .ऐसी मान्यता भी है की इसी दिन भगवन विष्णु ने मतस्य अवतार लिया था ,

सवाल ये है की  इसी दिन से ही संवत्सर का आरंभ क्यों माना जाता है ---

१.तो पहली बात यह मानी जाती है की चैत्र मास  में ही वृक्ष और लताएं  नव पल्लवित होती हैं .
२. कहते हैं की माघ मास  में मधुरस पर्याप्त मात्रा में मिलता है ,मगर इसका कहीं भी स्पष्ट उल्लेख नहीं है ,इसलिए चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से ही नव वर्ष का आरम्भ माना गया है .

इसी दिन पंचांग की पूजा का भी विधान है 

,बहुत सारे घरों में पंडित के द्वारा पंचांग की पूजा कराकर संवत सुनकर  नव वर्ष का स्वागत किया जाता है ,मुझे याद है हमारे घर में भी हमारे पूज्य दादाजी भी इस पूजा का आयोजन करते थे उसके बाद पूज्य  पिताजी और फिर हमारे भाइयों ने भी इस प्रथा को आगे बढाया .
चैत्र मास की प्रतिपदा को गुडी पड़वा के रूप में भी हर्सौलास से मनाया जाता है ,सूर्य को अर्घ्य देकर नव वर्ष का स्वागत किया जाता है .


 नवरात्री साल में मुख्यतः २ बार  मनाई जाती हैं जिसमें एक चैत्र पक्ष की और दूसरी आश्विन पक्ष की .इन दोनों में ही सामान रूप से माँ दुर्गा और कन्या की पूजा का विधान है .नवरात्री पूजन प्रतिपदा से दशमी तक मनाई जाती  है ,ज्यादातर लोग नवमी को कन्या पूजन करके उपवास समाप्त करते हैं .
पूजन के स्थान की अच्छी तरह से सफाई करें और अगर सम्भव हो तो पूजा घर को पानी से घो लें .
सभी भगवान् के वस्त्र बदल दें .माता की मूर्ति या फोटो को साफ़ कर लें . अब सबसे पहले घट स्थापना की तैयारी करें .

पूजा के लिए जो भी स्थान नियत हो वो स्थान ,पहनने वाले वस्त्र हमेशा शुद्ध हों ,आसन काला नहीं होना चाहिए ,ऐसी मान्यता है की पूजन के लिए ऊन  का आसन सर्वोत्तम होता है ,कहते हैं की काठ के ऊपर बैठकर पूजा करने से निर्धनता आती है ,और पत्थर पर बैठ कर पूजा करने से रोग आते हैं ,अतः कोशिश  करनी चाहिए की पूजा का स्थान और आसन दोनों ही पवित्र हों .

घट स्थापना -----

  1.   १ कलश मिटटी का या फिर पीतल का 
  2.   जों बोने के लिए एक मिट्टी का पात्र .
  3.   जटा  वाला  नारियल  .
  4. पान के या अशोक के पत्ते ५ .
  5. साफ़ मिट्टी या रेता .
  6. चावल १ बड़ा चम्मच .
  7. एक गहरी कटोरी .
  8. रोली ,और मोली .
  9. रूपये .इछानुसार .
  10. जोँ  २ बड़े चम्मच 
  11. नारियल के लिए कपडा . 

विधि -------

  1. कलश को अच्छी तरह से धो कर उसमें साफ़  पानी भरें .
  2. अब मिट्टी के पात्र को भी पानी से धो लें . 
  3. इसमें मिट्टी भरें .
  4. अब इस मिट्टी  में जों को चारों  ऒर फैलाते हुए बो दें .
  5. इसके बीच में कलश को रखें और कलश के गर्दन में मोली को चारों ओर से लपेटें .
  6. कटोरी में चावल भरकर इसे  कलश के ऊपर रखें और कटोरी के नीचे पहले कलश में आम के पत्तों  को सजाते हुए लगायें ताकि इस कटोरी से ठीक से सेट हो जाएँ .
  7. अब रोली की सहायता से कलश पर स्वस्तिक बनाएं .
  8. नारियल पर कपडा और  मोली  बाँध कर इसे चावलों वाली कटोरी के ऊपर रखें ,
  9. नारियल पर रूपये चढ़ाएं .

पूजन का सामान -----

  1. माता की चुन्नी .
  2. रोली , मोली  ,
  3. साबुत सुपारी .९ 
  4. जायफल ९  
  5. पान के पत्ते  ९ .
  6. हवन  सामिग्री १ किलो .
  7. काले तिल १ ० ० ग्राम .
  8. चावल धुले हुए ५ ० ग्राम .
  9. पञ्च मेवा कटी हुई २ बड़े चम्मच .
  10. गुड़  २ बड़े चम्मच .
  11. बूरा   १ बड़ा चम्मच .
  12. देशी घी २ बड़े चम्मच .
  13. रुई .
  14. चावल पूजा के अक्षत के लिए  
  15. धूप  बत्ती .
  16. चौकी १ .
  17. बड़ा दिया १ .
  18.  लाल कपडा बिछाने के लिए १ मीटर .
  19. गूगल १ चम्मच .
  20. ताम्र कुंड  हवन के लिए 
  21. कपूर .
  22. लौंग .
  23. दिए के लिए तेल या घी .
  24. पुष्प .
  25. बताशे प्रशाद के लिए 
  26. जल का लोटा 
  27. हवन के लिए आम की लकड़ी .

विधि -------------

  1.  चोकी के ऊपर लाल वस्त्र बिछाकर माता को चुन्नी उढ़ाकर  विराजित करें .
  2. हवन सामिग्री में गूगल ,मेवा,चावल,तिल ,जों, देशी घी ,बूरा,गुड़ को अच्छी तरह से मिलाकर सामिग्री को तैयार करें .
  3. अब माता के उत्तर पूर्व में घट रखें ,और दिए में घी या तेल सामर्थ्य के अनुसार भर कर और माता के समक्ष रखें .
  4. थाली में रोली,मोली ,चावल ,धूप बत्ती ,लौंग ,कपूर ,पुष्प ,बताशे रखें।

पूजन की विधि -----------

  1. आसन को बिछा कर बैठें और माँ का ध्यान करें .
  2. जल से आचमन करें,अब माता को स्नान कराएं  ,पुष्प समर्पित करें ,
  3. टीका करें ,दिया प्रज्व्व्लित करें और फिर माता की आराधना करें 
  4. आराधना में माता की स्तुति ,चालीसा पाठ  और आरती करें .
  5. अब हवन के लिए कुंड में लकड़ी लगाकर कपूर से प्रज्वलित करें और सभी लोगों को सामान भाग से सामिग्री दे कर हवन शुरू करें .
  6. हवन करने के बाद प्रशाद ,पान चढ़ाएं .
  7. हवन के लिए या तो पंडित बुलाकर हवन कराएं या फिर स्वयं करें ,स्वयं हवन करने के लिए मन्त्र किसी पंडित से पूँछ कर ही करें ,अन्यथा न करें .
  8. अंत में सबको प्रशाद बांटें .

उपवास ---

  1.    नवरात्री मे अधिकतर लोग उपवास रखते हैं ,अगर आप ९ दिनों का व्रत नहीं रख सकते हैं तो पहला और आखिरी  यानि की प्रतिपदा और अष्टमी का व्रत रखें .
  2. उपवास में फल ज्यादा खाएं और पानी भी लगातार पियें  ताकि शरीर में पानी की कमी न हो .
  3. व्रत ,उपवास शरीर के क्षमता के अनुसार ही रखना चाहिए . 
  4. नवरात्रि में माता का कीर्तन अवश्य करें ,ऐसी मान्यता है की यदि माता के छंद  नहीं गए जाते है तो माता एक पैर से खड़ी रहती हैं .
  5. संभव हो सके तो माता के मंदिर भी जायें . 

माँ दुर्गा के ९ रूपों की पूजा का विधान नवरात्री में है,और माँ के ९ रूपों की व्याख्या इस प्रकार है  -----

  1. प्रथम हैं माँ शैलपुत्री ,हिमालय पुत्री होने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा .
  2. नवरात्री के दुसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी   की पूजा का विधान है ,तप और जप करने के कारन इनका नाम ब्रह्मचारिणी पड़ा  .
  3. माँ चंद्रघंटा की पूजा नवरात्री की तीसरे दिन की जाती है ,इस रूप में माँ के मस्तक पर अर्धचन्द्र बना है अतः इस रूप को चंद्रघंटा कहते हैं .
  4. चतुर्थी को माँ कूष्मांडा की अर्चना का विधान है .ऐसा कहा जाता है मंद हंसी के द्वारा माँ ने ब्रम्हांड को उत्पन्न किया .इसलिए इन्हें कुष्मांडा  कहा जाता है 
  5. चार भुजाओं वाली माँ स्कंदमाता की अर्चना पंचमी को की जाती है .
  6. जिनकी उपासना से भक्तों के रोग ,शोक ,भय ,और संताप का विनाश होता है ऐसी माँ कात्यायनी की उपासना छठे दिन की जाती है .
  7. काल से रक्षा करने वाली देवी कालरात्रि की उपासना सातवें दिन की जाती है .
  8. शांत रूप वाली ,भक्तों को अमोघ फल देने वाली देवी महागौरी की पूजा आठवें दिन की जाती है .
  9. भक्तों की  समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली देवी सिध्दात्री की पूजा नवें दिन की जाती है .

 ऐसा माना जाता है की ,नवराति में माँ की आराधना करने में सबसे पहले माता के १ ० ८ नामों के पढना चाहिए ,जो इस तरह हैं ---------

  1. सती .
  2. साध्वी .
  3. भवप्रीता .
  4. भवानी  
  5. भवमोचनी .
  6. आर्या .
  7. दुर्गा .
  8. जया .
  9. आध्रा .
  10. त्रिनेत्रा .
  11. शूलधारिणी .
  12. पिनाकधारिणी .
  13. चित्रा .
  14. चंद्रघंटा .
  15. महातपाः .
  16. मनः .
  17. बुद्धिः .
  18. अहंकारा .
  19. चित्तरूपा .
  20. चित्ता 
  21. चितिः  
  22. सर्वमंत्रमयी .
  23. सत्ता .
  24. सत्यान्द्स्वरूपिनी .
  25. अनंता .
  26. भाविनी .
  27. भाव्या .
  28. भव्या .
  29. अभव्या .
  30. सदागति .
  31. शाम्भवी .
  32. देवमाता .
  33. चिंता .
  34. रत्नप्रिया .
  35. सर्वविद्या .
  36. दक्ष  कन्या 
  37. दक्ष यग्यविनाशिनी 
  38.  अपर्णा .
  39. अनेकवर्णा .
  40. पाटला .
  41. पाटलावती .
  42. पट्टाम्बर परिधाना .
  43. कल्मंजीर्रंजनी .
  44. अमेयविक्रमा .
  45. क्रूरा .
  46. सुंदरी .
  47. सुरसुन्दरी .
  48. वनदुर्गा .
  49. मातंगी .
  50. मतंग्मुनिपूजिता .
  51. ब्राह्मी .
  52. माहेश्वरी .
  53. ऐन्द्री .
  54. कौमारी .
  55. वैष्णवी .
  56. चामुंडा .
  57. वाराही .
  58. लक्ष्मी .
  59. पुरषा कृति  .
  60. विमला .
  61. उत्कार्शनी 
  62. ज्ञाना  .
  63. क्रिया .
  64. नित्या .
  65. बुद्धिदा .
  66. बहुला .
  67. बहुलप्रेमा 
  68. सर्ववाहन वाहना .
  69. निशुम्भ्शुम्भ्हन्नी .
  70. महिशाशुर मर्दिनी .
  71. मधुकैटभ हननी .
  72. चंड मुंड विनाशिनी .
  73. सर्व असुर विनाशा .
  74. सर्वदानव घातिनी .
  75. सर्वशात्र्मायी .
  76. सत्या .
  77. सर्वाशास्त्र्धरिणी .
  78. अनेकाश्त्र हस्ता  
  79. अनेकाश्त्र धारिणी .
  80. कुमारी .
  81. एक कन्या .
  82. कैशोरी .
  83. युवती .
  84. यति .
  85. अप्रोढ़ा .
  86. प्रोढा .
  87. वृद्ध माता .
  88. बलप्रदा .
  89. महोदरी .
  90. मुक्तकेशी .
  91. घोररूपा .
  92. महाबला .
  93. अग्निज्वाला .
  94. रौद्रमुखी .
  95. कालरात्रि .
  96. तपस्वनी .
  97. नारायणी .
  98. भद्रकाली .
  99. विष्णुमाया .
  100. जलोदरी .
  101. शिवदूती .
  102. कराली .
  103. अनंता .
  104. परमेश्वरी .
  105. कात्यायनी .
  106. सावित्री .
  107. प्रत्यक्षा .
  108. ब्रह्मवादिनी .
देवी के नामों का जो प्रतिदिन पाठ करता है उसके लिए तीनों लोकों में कुछ भी असाध्य नहीं है .
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अब  माता की सप्तसती मन्त्रों से पूजा अर्चना आरम्भ की जानी चाहिए ,जो इस प्रकार से है ----------



  1. देवी प्रप्न्नाति हरे प्रसीद प्रसीद मार्त जगतो अखिलस्य ,प्रसीद विश्वेश्वरी पाहि विश्वं त्वमीश्वरी चराचरस्य .
  1. सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके  ,शरण्ये त्रयम्बिके नारायणी नमोस्तुते । 
  1. देवी त्वं भक्तसुलभे सर्वकार्य विधायिनी ,कलोहि  कार्य सिद्धर्थ्य मुयाम ब्रूह यत्नतः .
  1. ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी  भगवती हि सा , बलादा कृष्य  मोहाय महामाया प्रयक्षति । 
  1. दुर्गे स्मरता हरसि भीतिमशेष  जन्तोः ,स्वस्थे स्मरता मतिमतीव शुभां ददासि । 
  1. दारिद्य दुःख भय हारिणी का त्वन्द्या ,सर्वोपकार करनाय सदार्द चिता । शरणागत दीनार्त परित्राण परायने ,सर्व्स्यार्ति हरे नारायणी नमोस्तुते । 
  1. सर्वस्वरूपे सेर्वेषे सर्वशक्ति समन्विते ,भयेभ्यस्त्राहि नो देवी दुर्गे नमॉस्तुते । 
  1.  रोगान शेशान  पहन्सि तुष्टा ,रुष्टा तू कामान सक्लांभिशितान । त्वं आश्रीतानाम न विपिन्नरानाम ,त्व्माश्रिता ह्याश्रिता प्रयन्ति  '
  1. सर्वबाधा प्रस्मनम त्रैलोकश्य अखिलेश्वरी ,एवमेव त्वया कार्यमस्द्वैरी  .विनाशं । 
            प्रतिदिन माँ दुर्गा के संक्षिप्त स्तुति सम्पूर्ण कार्य और मनोरथ पूर्ण करने वाली है ।  

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                      तत्पचात माँ का कीलक स्त्रोत का पाठ किया जाना चाहिए -------

महर्षि मार्कण्डेय जी बोले -----
कल्याण प्राप्ति हेतु निर्मल ज्ञानरूपी शरीर धारण करने वाले दिव्य नेत्रों वाले ,तथा मस्तक पर अर्धचन्द्र धारण करने वाले भगवन शिव जी! को नमस्कार है 
,इस धरा पर जो मनुष्य इस कीलक मन्त्र को जानने वाला है वाही कल्याण को प्राप्त करता है । जो केवल सप्तशती से ही देवी की स्तुति करता है उसे इस कीलक से देवी की सिद्धि हो जाती है ।देवि की सिद्धि  के लिए दूसरी साधना की आवश्यकता नहीं रह जाती ,लोगों के मन में आशंका थी की केवल सप्तशती   के मन्त्रों की उपासना अथवा अन्य मन्त्रों की उपासना से भी सामान रूप से सब कार्य सफल हो जाते हैं तो इनमें से कौन सा साधन श्रेष्ठ है । 
         इन सभी शंकाओं को लेकर भगवन शंकर ने अपने सामने आये भक्तों को समझते हुए कहा---- सप्तशती नामक सम्पूर्ण स्त्रोत कल्याण को देने वाला है और तभी भगवन शंकर ने माँ के सप्तशती नामक स्त्रोत को गुप्त कर दिया । इसलिए मनुष्य इसको बड़े पुण्य  से प्राप्त करता है । 
जो भी मनुष्य अष्टमी को या कृष्ण पक्ष की चतुर्दसी को देवी को अपना सर्वस्व  समर्पित कने के पश्चात् उसे प्रसाद रूप में ग्रहण करता है ,उस पर माँ दुर्गा प्रसन्न हो जाती हैं,अन्यथा नहीं  । इस प्रकार शिव जी द्वारा इस स्त्रोत को कीलित किया गया है ,और जो पुरुष इस स्त्रोत को निश्कीलित करके नित्य प्रति पाठ करता है ,वह सिद्ध हो जाता है और वही गंधर्व होता है । 
इस संसार में सर्वत्र विचरते हुए भी उस मनुष्य को भय नहीं रहता म्रत्यु के पश्चात मोक्ष प्राप्त करता है । किन्तु इस कीलक की विधि को जानकार ही सप्तसती का पाठ करना चाहिए । कीलन  और निष्कीलन के ज्ञान के पश्चात यह स्त्रोत निर्दोष हो जाता है । ऐसा कहा जाता है , की स्त्रियों में जो सौभाग्यहैं ,इसी पाठ की कृपा स्वरूप हैं । 
         इस स्त्रोत का पाठ उच्च स्वर में करने से ही की जानी चाहिए । उस देवी की स्तुति अवश्य की जानी चाहिए जिसके प्रसाद स्वरूप सौभाग्य ,आरोग्य ,सम्पत्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है । 
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              इसके उपरांत अर्गला स्त्रोत का पाठ करना चाहिए जो इस प्रकार है --------------

जयंती ,मंगला ,काली ,भद्रकाली,कपालिनी ,दुर्गा ,क्षमा ,शिव,धात्री स्वाहा ,स्वधा इन रूपों में प्रसिद्ध माँ तुमको नमस्कार है ..

  1. सब जगह व्याप्त प्राणियों के दुःख हरने वाली माँ !कालरात्रि तुम्हें नमस्कार है ,मधुकैटभ का नाश करने वाली माँ ब्रह्मा जी को वर देने वाली माँ तुम मुझे रूप दो जय दो और काम क्रोध रुपी शत्रुओं का नाश करने वाली माँ तुमको मेरा नमस्कार है .। 
  2. महिषासुर मर्दिनी माँ! भक्तों को सुख देने वाली तुमको नमस्कार हो ,तुम मुझे रूप दो के दो और मेरे शत्रुओं का नाश करो .। 
  3. रक्तबीज का वध करने वाली ,माँ !चंड मुंड विनाशिनी ,तुम मुझे रूप,जय दो और मेरे शत्रुओं का नाश करो .। 
  4. शुम्भ-निशुम्भ का मर्दन करने वाली हे देवी! मुझको स्वरूप दो ,जय दो और मेरे काम,क्रोध रुपी शत्रुओं का नाश करो .। 
  5. हे सम्पूर्ण सोभाग्य  को देने वाली !,पूजित युगल चरणों वाली माँ तुम मुझे रूप दो ,यश दो ,मेरे शत्रुओं का नाश करो । 
  6. तुम सब शत्रुओं का नाश करने वाली! हो ,तुम्हारे रूप और चरित्र अमित हैं ,मुझे रूप दो ,यश दो और काम क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो । 
  7. इस संसार में जो भक्ति से तुम्हारी पूजा करते हैं सबके पापों का नाश करने वाली माँ !तुम उन सबको रूप और यश दो और उनके शत्रुओं का नाश करो । 
  8. माँ रोगों का नाश करने वाली जो भी भक्त तुम्हारी पूजा भक्ति पूर्वक करते हैं उनको रूप और जय दो ,उनके शत्रुओं का नाश करो । 
  9.  हे देवी! माँ मुझे सोभाग्य और आरोग्य दो मुझे रूप दो जय दो और मेरे काम,क्रोध रुपी शत्रुओं का नाश करो । 
  10. हे माँ ! जो मुझसे बैर रखते हैं उनका नाश करके मेरा बल बढाओ ,मुझे रूप,जय दो मेरे शत्रुओं का नाश करो । 
  11. माँ! मेरा कल्याण करके मुझे उत्तम सम्पत्ते प्रदान करो ,मुझे रूप दो जय दो और मेरे शत्रुओं का नाश करो ।  
  12. देवताओ और राक्षसों के मुकुटों द्वारा स्पर्श किये चरणों वाली माँ !अम्बे मुझे स्वरूप ,जय दो ।  
  13. हे देवी! अपने भक्तों को विद्वान ,लक्ष्मीवान और कीर्तिमान बनाकर उन्हें रूप और जय दो ,उनके शत्रुओं का नाश करें । 
  14. हे देवी ! प्रचंड दैत्यों के मान का नाश करने वाली चण्डिके !मुझे रूप दो जय दो ,और मेरे काम क्रोध रुपी शत्रुओं का नाश करो .
  15. हे माँ ! चार भुजाओं वाली परमेश्वरी !मुझे रूप ,जय दो मेरे शत्रुओं का नाश करो । 
  16. विष्णु से सदा स्तुति की हुई माँ ! हिमालय कन्या पारवती के भगवान् शंकर से स्तुति की गयी माँ ,मुझे रूप दो जय दो ,और मेरे शत्रुओं का नाश करो । 
  17. इंद्र द्वारा सद्भाव से पूजित माँ! तुम मुझे रूप दो जय दो और मेरे काम क्रोध रुपी शत्रुओं का नाश करो ।  
  18. प्रचंड ,भभुदंड से दैत्यों का दमन करने वाली माँ !मुझे रूप दो ,यश दो ,मेरे शत्रुओं का नाश करो । 
  19. हे देवी! तुम अपने भक्तों को असीम आनंद देने वाली हो ,मुझे रूप ,जय दो और मेरे शत्रुओं का नाश करो 
  20. मेरी इच्छानुसार  चलने वाली सुंदर पत्नी प्रदान करो ,माँ ! जो संसार सागर से तारने वाली हो और उत्तम कुल में उत्पन्न हुई हो .        

 जो मनुष्य इस महा स्त्रोत का पाठ करता है वह श्रेष्ठ फल प्राप्त करता है और प्रचुर धन भी प्राप्त करता है .

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दोस्तों में एक विशेष स्तुति माता की करती हूँ और आप सभी के साथ इसे बांटना चाहती हूँ ,माँ की ये स्तुति समस्त सुखों को  देने वाली है ------

   हे सिंघ्वहिनी  जगदम्बे तेरा ही एक सहारा है --------

  1. मेरी विपदाएं दूर करो ,करुणा की द्रष्टि  इस ओर करो । संकट के बीच घिरा हूँ माँ आशा से तुम्हें पुकारा है .
  2. कुमकुम ,अक्षत और पुष्पों से नैवेध धूप और अर्चन से । नित तुम्हें रिझाया करती हूँ क्यों अब तक नहीं निहारा है .
  3. जब-जब मानव पर कष्ट पड़े तब-तब तुमने अवतार लिया । हे कल्याणी ! हे रुद्राणी ,इन्द्राणी रूप तुम्हारा है .
  4. भाव -बाधाएं हरने वाली जन-जन की बाधाएं हरती हो । मेरी भी बाधाएं हरना जग जननी नाम तुम्हारा है .
  5. कौमारी ,सरस्वती हो तुम ,ब्रम्हाणी तुम वैष्णवी हो ।कर शंख चक्र और पुष्प लिए लक्ष्मी भी रूप तुम्हारा है .
  6. मधुकैटभ सा दानव मारा और चंड मुंड को चूर किया ।हे महेश्वरी ,महामाया चामुंडा रूप तुम्हारा है .
  7. धूम्रलोचन को तुमने मारा ,महिषासुर तुमने  संहारा है । हे सिंघ्वाहिनी !अष्टभुजी नवदुर्गा रूप रुम्हारा है .
  8. था शुम्भ-निशुम्भ असुर मारा और रक्तबीज का रक्त पिया । हे शिवदूती! हे गौरी माँ काली भी रूप तुम्हारा है .
  9. जब वैश्य -सुरथ ने तप करके अपना तन तुम्हें चढ़ाया था । दर्शन दे जीवनदान दिया ज्योतिर्मय रूप तुम्हारा है .
  10. तेरी शरणागत में आकर तेरी ही महिमा को गाकर ।माँ ! सप्तशती के मन्त्रों से भक्तों ने तुहें पुकारा है .

                  हे सिंघ्वाहिनी जगदम्बे तेरा ही एक सहारा है  ---------------------

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इस प्रकार से आप सभी नवरात्री की पूजा कि शरुआत करें ,अगले अंक में आप सबके साथ मैं माँ के नौं रूपों की व्यख्या करुँगी । 


Monday, March 24, 2014

पापमोचनी एकादशी /papmochni ekadashi /27 Mrach 2014

एकादशी का व्रत रखने से या कथा सुनने मात्र से ही मनुष्य कई प्रकार के कष्टों से मुक्ति पा लेता है ,पापमोची एकादशी चैत्र माह के कृष्ण पक्ष को मनायी जाती है। इस दिन भगवान् विष्णु को अर्घ्यदान देकर पूजा कि जाती है ,तत्पचात धूप -दीप,चन्दन आदि के द्वारा नीरंजना करनी चाहिए। 

प्राचीन समय की बात है, चित्ररथ नाम का एक वन था. इस वन में गंधर्व कन्याएं और देवता सभी विहार करते थें. एक बार मेधावी नामक ऋषि इस वन में तपस्या कर रहा था. तभी वहां से एक मंजुघोषा नामक अप्सरा ऋषि को देख कर उनपर मोहित हो गई. मंजूघोषा ने अपने रुप-रंग और नृ्त्य से ऋषि को मोहित करने का प्रयास किया. उस समय में कामदेव भी वहां से गुजर रहे थें, उन्होने भी अप्सरा की इस कार्य में सहयोग किया. जिसके फलस्वरुप अप्सरा ऋषि की तपस्या भंग करने में सफल हो गई.कुछ वर्षो के बाद जब ऋषि का मोहभंग हुआ, तो ऋषि को स्मरण  हुआ कि वे तो शिव तपस्या कर रहे थें. अपनी इस अवस्था का कारण उन्होने अप्सरा को माना. और उन्होने अप्सरा को पिशाचिनी होने का श्राप दे दिया. शाप सुनकर मंजूघोषा ने कांपते हुए इस श्राप से मुक्त होने का उपाय पूछा. तब ऋषि ने उसे पापमोचनी एकादशी व्रत करने को कहा. स्वयं ऋषि भी अपने पाप का प्रायश्चित करने के लिये इस व्रत को करने लगें. दोनों का व्रत पूरा होने पर, दोनों को ही अपने पापों से मुक्ति मिली.
तभी से पापमोचनी एकादशी का व्रत करने की प्रथा चली आ रही है. 

यह व्रत व्यक्ति के सभी जाने- अनजाने में किये गये पापों से मुक्ति दिलाता है. 

कबीर दास जी ने कहा है------

                  पर नारी पैनी छुरी,मत कई लगो अंत,रावण के दश सर गधे,पर नारी संग । 

                 एक कंचन एक कामिनी दुर्गम घाटी दोय,इन दोनों को पारकर श्रेय लई कोई कोय ॥       


Saturday, March 22, 2014

bhajan




                 भगवान् को ढूँढन मैं निकली वो यहाँ मिले न वहाँ मिले -२ 


१. गंगा ढूंढी ,यमुना ढूंढी ,मैंने ढूंढ लई सरयू सारी -२ 

                                      मैंने ढूंढ लई सरयू सारी ,वो यहाँ मिले न वहाँ मिले ---

२. मंदिर ढूंडा ,मस्जिद ढूंढी ,मैंने ढूंढ लई गिरिजा सारी -२
                                      मैंने ढूंढ लई गिरिजा सारी ,वो यहाँ मिले न वहाँ मिले ---

३. काशी ढूंढी ,मथुरा ढूंढी मैंने ढूंढ लई गोकुल सारी -२      
                                     मैंने ढूंढ लई गोकुल सारी ,वो यहाँ मिले न वहाँ मिले ---

४. जब अंतर्मन में जोत जली ,तब सतगुरु ने उपदेश दिया -२
                                     तब सतगुरु ने उपदेश दिया ,मन मंदिर में भगवान् मिले ---


Thursday, March 20, 2014

बासेड़ा या बसोड़ा




होली के सात या आठ दिन बाद बासेड़ा चैत्र के कृष्ण पक्ष में सोमवार या वीरवार को मनाया जाता है ,इस दिन शीतला माता की पूजा का विधान है।
जैसा कि नाम से ही अर्थ समझ आता है बसेड़ा यानि कि बासी भोजन ,तो इस पूजा के लिए एक दिन पहले रात्रि में ही सोंठ और गुड से गुझिया बनायीं जाती है जिसे पिढ़कुली कहा जाता है साथ ही बाजरा भी रखा जाता है ,पूजन की थाली में रोली,चावल,दही ,चीनी धूपबत्ती आदि रख कर इसे घर के सभी सदस्यों से हाथ लगाकर फिर शीतला माता की पूजा कि जाती है ।
इस दिन बसी भोजन किया जाता है यदि सब लोग बासी भोजन न कर सकें तो पूजा करने वाले व्यक्ति को तो अवश्य ही बसी भोजन ही खाना चाहिए । 

इस पूजा की कथा इस प्रकार है ----------

     एक गांव में एक बुढ़िया रहती थी,वह  बसेढे के दिन शीतला माता की पूजा करती थी और ठंडी रोटी यानि कि बासी भोजन करती थी ,उसके गांव में और कोई भी इस पूजा को नहीं करता था ।
एक दिन  गांव में आग लग गयी और बुढ़िया के अतिरिक्त सभी की झोपडी जल गयीं ,इससे सभी को बहुत आश्चर्य हुआ ,सब ने बुढ़िया से इसका कारण पुछा तब ने बताया कि बासेढे के दिन ठंडी रोटी खाती थी और शीतला माता की पूजा करती थी और तुम सभी नहीं करते थे इसीलिए ऐसा हुआ है ।
और अभी से गांव के सभी लोग इस पूजा को विधिविधान से करने लगे ।
इस दिन घर में नीम लाकर टांगना भी शुभ माना जाता है । अब इस पूजा का चलन लगभग समाप्त सा हो रहा है परन्तु अभी भी उत्तर प्रदेश में इसे बहुत से घरों में मनाया जाता है ,कुछ लोग शीतला माता के दर्शन होली वाले दिन रंग खेलने के बाद ही करते हैं और तब कोई काम शुरू करते हैं ,माँ शीतला को बताशे का प्रसाद चढ़ाया जाता है ॥ 

इसकी एक कथा इस प्रकार है -----

  एक राजा की सात बेटी थीं ,रानी रोज भोजन बनाती औ जब राजा और रानी खाने के लिए बैठते तब उसमें केवल एक ही रोटी रह जाती दोनों बाँट कर खा लेते ,अंत में दुखी होकर उन्होंने एक युक्ति सोची ,अपनी बेटियों को मामा के घर ले जाने के बहाने उन्हें जंगल में छोड़ कर अपनी टोपी पेड़ पर तंग कर घर आ गए। 
सातों बहने जंगल में भटकती -भटकती अपने गधों पर सवार एक गांव में आ गयीं वहाँ उन्होंने अपने गधों के वास्ते कुंए पर पानी भर रही महिलाओं से पानी पिलाने को कहा , परन्तु उस गांव में लगभग सभी के घरों में माता (चेचक) निकली थी और ऐसे में कोई किसी को कुछ भी खिलाता पिलाता नहीं है। 
उन महिलाओं  ने पानी पिलाने से मना कर दिया तब उन सातों बहनों ने कहा -"आप हमारे गधों को पानी पिलाएं और नहलाएं ताकि वो खुश होकर जमीन पर लोटने लगें और तब आप सभी इनके नीचे की गीली मिट्टी को अपने बच्चों के तन पर लेप लगा दें वो ठीक हो जायेंगे "
तब उन औरतों ने ऐसा ही किया और उनके बच्चे ठीक हो गए। उस राजा के पुत्र को भी माता निकली थीं और जब यह बात राजा तक पहुंची और तब उन्होंने उन लोगों से पूछा कि कैसे आप सभी के बच्चे ठीक हो गए । 
तब उन सभी ने सविस्तार बताया ,राजा ने सातों बहनों तक संदेशा भिजवाया परन्तु उन बहनों ने आने से मना कर दिया ,और कहा की जब राजा और रानी स्वयं भोजन बनाएंगे और यज्ञ करेंगे तब हम वहाँ आकर भोग लगाएं। 
राजा और रानी ने ऐसे ही किया परन्तु क्योंकि भोग देशी घी में बना था इसलिए उन्होंने भोग लगाने से इंकार कर दिया ,फिर सारा भोग तेल में बनाया गया तब उन बहनों ने भोग लगाया और पूजन किया और उस प्रसाद से राजा का बीटा भी ठीक हो गया । और इस तरह इस बासेढे की पूजा का विधान आरम्भ हुआ ॥ 

ऐसा माना जाता है कि वो सातों बहने देवी का सवरूप थीं ॥