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Saturday, January 17, 2015

bhajan /भजन

                            तेरा पल-पल बीता जाये ,मुख से जप लो नमः शिवाय
                                   ओम नमः शिवाय -ओम नमः शिवाय  
१. शिव-शिव तुम ह्रदय से बीजो,मन मंदिर का पर्दा खोलो-२
                           तेरा अवसर खाली  न जाये ,मुख से जप लो नमः शिवाय 
२. ये दुनिया पंक्षी का मेला समझो उड़ जाना है अकेला -२
                           तेरा तन-मन साथ न जाये,मुख  से जप लो नमः शिवाय
३. मुसाफिरी जब पूरी होगी,चलने की मजबूरी होगी -२    
                          पिंजरे प्राण रह जाये ,मुख से जप लो नमः शिवाय
४. शिव पूजन मस्त बने जा भक्ति रस पान किये जा -२ 
                         दर्शन विश्वनाथ के पय ,मुख से जप लो नमः शिवाय

Friday, January 9, 2015

भजन



भजन ---------

                        क्षण भंगुर जीवन की कलिका कल प्रात को जाने खिली न खिली      

१. मलयालम की शुचि -शीतलता - २ 

                          सुगंध समीर खिली न खिली ,,,,,,क्षण भंगुर जीवन की ---

२. काली कल कुठार लिए फिरता -२ 

                         तन मन से चोट झिली न झिली ----क्षण चंगुर जीवन की ---

३. कह ले हरी नाम अरी रसना -२ 

                       फिर अंत समय में हिली न हिली -----क्षण भंगुर जीवन की -------

Tuesday, December 30, 2014

पौष मास पुत्रदा एकादशी दिनांक १ जनवरी २०१५ /pasuh ekadashi putrda ekadashi 1/1/2015


जो व्यक्ति और कोई भी एकादशी का व्रत नहीं रखते वे इस पुत्रदा एकादशी का व्रत करके अपनी मनोकामनाओं को पूर्ण कर सकते हैं ।

कथा ------

भगवान श्री कृष्ण जी बोले ---हे धर्म पुत्र ! पौष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम पुत्रदा एकादशी है और इसके महात्मय की कथा इस प्रकार है --
एक समय भद्रवती नगर में संकेतमान नाम का राजा राज्य करता था ,उसकी स्त्री का नाम शैव्या था ,पूरा भवन विश्व-विभूतियों से भरा था,द्वार चिन्तामणियों से सुसज्जित था।  परन्तु राजा उदास था और उसे अपने चारों ओर अँधेरा महसूस होता था ,कारन की उसके कोई भी संतान नहीं थी। हजारों यज्ञ करने के बाद भी उसे कोई संतान नहीं हुई।
हर कर उसके मन में विष खाने और जंगल में जाने के विचार आने लगे थे ,फिर विचार किया आत्मघात करना महापाप है और फिर इस चिंता से मुक्त होने के लिए उसने वनवासियों से परामर्श लेने का विचार बनाया।
घोड़े पर सवार वन विहार करने लगा, वहां पशु-पक्षी इत्यादि जीवों को पुत्रों के साथ खेलता देखा मन में कहने लगा की ये मेरे से भी अधिक सौभाग्यशाली हैं।
आगे चला तो एक सरोवर मिला जिसमें मछलियाँ आदि जलचर भी अपनी संतानों के साथ विहार कर रहे थे ,
चारों तरफ मुनियों के आश्रम थे ,राजा घोड़े से उतरे और मुनियों की शरण में गए ,प्रणाम किया और अपना दर्द कहा ,मुनि बोले हम विश्व के देवता हैं और इस सरोवर को पतित पवन समझ कर यहाँ स्नान करने आये हैं ,आज पुत्रदा एकादशी है जो पुत्र की इच्छा को पूर्ण करता है।
राजा बोला क्या यह दिव्य फल मुझे इस व्रत के फल से मुझे भी प्राप्त हो जायेगा ,विश्वदेव बोले -राजन हमारी बात सत्य होगी।
राजा ने पूर्ण श्रद्दा के साथ स्नान किया और पुत्रदा एकादशी का व्रत किया ,रात्रि जागरण किया और भवन में चला गया। पुत्रदा एकादशी के फल से उसे पुत्र की प्राप्ति हुई ,कथा को सुनने मात्र से ही स्वर्ग मिलता है ऐसी मान्यता है।

इस दिन नारायण जी की पूजा की जाती है ,इस दिन गौ के दूध का सागर लिया जाना चाहिए ।

Sunday, December 21, 2014

bhajan/भजन

          गुरु पास रहे या दूर रहे नज़रों में समाये रहते हैं, 
         इतना तो बता दे कोई मुझे क्या कृपा इसी को कहते हैं । 
१. जीवन की घड़ियाँ छोटी हैं,दुनिया की मंजिल लम्बी है ,
छोड़ो  गुरु पर जिम्मेदारी गुरु आप सम्हाले रहते हैं -- गुरु पास रहे -------

२. सुख में भी आप नज़र आते ,दुःख में भी धीरज बंधवाते ,
दुःख -सुख समझो एक समान गुरु याद दिलाते  रहते हैं ----गुरु पास रहे---

३. जिस अंश के हम सब प्राणी हैं,उस अंश के हैं सारे प्राणी ,
माया में फंसकर भूल गए ,गुरु याद दिलाते रहते हैं---गुरु पास रहे या ------
 

 

Saturday, October 18, 2014

dhantryodashi/धनतेरस /धनत्रयोदशी /दिनांक 9 नवंबर २०१५

धनतेरस दीपावली के २ दिन पहले त्रयोदशी को मनायी जाती है।  इस दिन मृत्यु के देवता यम और धन के देवता कुबेर की पूजा का विशेष महत्त्व है
कहा जाता है कि इस दिन धन्वन्तरि का जन्म हुआ था और जिस समय उनका अवतरण हुआ था उनके हाथ में कलश था और इसी कारण इस दें नए बर्तन खरीदने के परम्परा है। और बरतन चाँदी ,पीतल या तांबे का लेना चाहिए ,स्टील का बरतन नहीं लेना चाहिए।मन जाता है की स्टील में लोहे का अंश होता है और इसीलिए स्टील का बर्तन नहीं लिया जाना चाहिए ॥

धनतेरस के दिन चांदी खरीदने की भी प्रथा है. इसके पीछे यह कारण माना जाता है कि यह चन्द्रमा का प्रतीक है जो शीतलता प्रदान करता है और मन में संतोष रूपी धन का वास होता है.

धनतेरस की शाम घर के बाहर मुख्य द्वार पर और आंगन में दीप जलाने की प्रथा भी है.धनतेरस के संदर्भ में एक लोक कथा प्रचलित है कि एक बार यमराज ने यमदूतों से पूछा कि प्राणियों को मृत्यु की गोद में सुलाते समय तुम्हारे मन में कभी दया का भाव नहीं आता क्या. दूतों ने यमदेवता के भय से पहले तो कहा कि वह अपना कर्तव्य निभाते है और उनकी आज्ञा का पालन करते हें परंतु जब यमदेवता ने दूतों के मन का भय दूर कर दिया तो उन्होंने कहा कि एक बार राजा हेमा के ब्रह्मचारी पुत्र का प्राण लेते समय उसकी नवविवाहिता पत्नी का विलाप सुनकर हमारा हृदय भी पसीज गया लेकिन विधि के विधान के अनुसार हम चाह कर भी कुछ न कर सके.
 कथा के अनुसार किसी समय में एक राजा थे जिनका नाम हेम था. दैव कृपा से उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई. ज्योंतिषियों ने जब बालक की कुण्डली बनाई तो पता चला कि बालक का विवाह जिस दिन होगा उसके ठीक चार दिन के बाद वह मृत्यु को प्राप्त होगा. राज इस बात को जानकर बहुत दुखी हुआ और राजकुमार को ऐसी जगह पर भेज दिया जहां किसी स्त्री की परछाई भी न पड़े. दैवयोग से एक दिन एक राजकुमारी उधर से गुजरी और दोनों एक दूसरे को देखकर मोहित हो गये और उन्होंने गन्धर्व विवाह कर लिया.
विवाह के पश्चात विधि का विधान सामने आया और विवाह के चार दिन बाद यमदूत उस राजकुमार के प्राण लेने आ पहुंचे. जब यमदूत राजकुमार प्राण ले जा रहे थे उस वक्त नवविवाहिता उसकी पत्नी का विलाप सुनकर उनका हृदय भी द्रवित हो उठा परंतु विधि के अनुसार उन्हें अपना कार्य करना पड़ा. यमराज को जब यमदूत यह कह रहे थे उसी वक्त उनमें से एक ने यमदेवता से विनती की हे यमराज क्या कोई ऐसा उपाय नहीं है जिससे मनुष्य अकाल मृत्यु के लेख से मुक्त हो जाए. दूत के इस प्रकार अनुरोध करने से यमदेवता बोले हे दूत अकाल मृत्यु तो कर्म की गति है इससे मुक्ति का एक सरल उपाय मैं तुम्हें बताता हूं ". कार्तिक कृष्ण पक्ष की रात जो प्राणी मेरे नाम से पूजन करके दीप माला दक्षिण दिशा की ओर भेट करता है उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहेगा।

                         और तभी से धनतेरस के दिन दक्षिण दिशा की ओर दिया जलाया जाने लगा।

Tuesday, September 23, 2014

शारदीय नवरात्री /shardiy navratri 13 अक्टूबर २०१५


 नवरात्री का हिन्दू धर्म में बहुत महत्त्व है और इन दिनों माँ दुर्गा के भक्त माँ के नौ रूपों की विधिविधान से पूजा करते हैं ,शारदीय नवरात्री आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से आरम्भ होकर नवमी तिथि को कन्या पूजन के साथ समाप्त की जाती है।  इस वर्ष यह नवरात्री दिनांक 13 अक्टूबर २०१५ से आरम्भ होकर अक्टूबर को समाप्त होगी।

 नौ दिनों तक चलने नवरात्र पर्व में माँ दुर्गा के नौ रूपों क्रमशः शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धदात्री देवी की पूजा का विधान है. नवरात्र के इन प्रमुख नौ दिनों तक देवी दुर्गा का पूजन, दुर्गा सप्तशती का पाठ इत्यादि धार्मिक किर्या कलाप संपन्न किए जाते हैं॥


पूजन में सर्वप्रथम स्वच्छ स्थान में माता की मूर्ती अपनी सामर्थ्य के अनुसार मिटटी,चांदी ,पीतल या फिर तस्वीर लेकर एक चौकी पर स्वच्छ लाल वस्त्र बिछाकर स्थापित करें ,अब एक मिटटी के पात्र में मिट्टी डालकर बीच में पीतल,ताम्बे या फिर मिटटी का कलश भरकर रखें ,इसमें थोड़ा सा शहद  डालें ,कलश के ऊपर एक पात्र मैं अक्षत डालें और इसके चारों ओर आम के पत्ते लगाएं । अब बाकि की मिट्टी में जौ  बो दें (इसे ही खेतड़ी कहा जाता है ) यदि स्वयं न कर सकें तो पुरोहित के द्वारा भी इस विधान को कराया जा सकता है । कलश की स्थापना के साथ ही नवदुर्गा पूजन का आरम्भ हो जाता है ,यदि आप नौ दिनों के लिए दीपक भी प्रज्वलित करना चाहते हैं तो इसी समय अखंड ज्योति भी जल कर रखें, अखंड ज्योति का स्थान हमेशा उत्तर पूर्व में रखें । और दुर्गा सप्तसती,दुर्गा चालीसा ,दुर्गा स्तुति से माँ को प्रसन्न करें ।

माँ के नौ रूपों की व्याख्या इस प्रकार है ------

  1. प्रथम हैं माँ शैलपुत्री ,हिमालय पुत्री होने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा .
  2. नवरात्री के दुसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी   की पूजा का विधान है ,तप और जप करने के कारन इनका नाम ब्रह्मचारिणी पड़ा  .
  3. माँ चंद्रघंटा की पूजा नवरात्री की तीसरे दिन की जाती है ,इस रूप में माँ के मस्तक पर अर्धचन्द्र बना है अतः इस रूप को चंद्रघंटा कहते हैं .
  4. चतुर्थी को माँ कूष्मांडा की अर्चना का विधान है .ऐसा कहा जाता है मंद हंसी के द्वारा माँ ने ब्रम्हांड को उत्पन्न किया .इसलिए इन्हें कुष्मांडा  कहा जाता है 
  5. चार भुजाओं वाली माँ स्कंदमाता की अर्चना पंचमी को की जाती है .
  6. जिनकी उपासना से भक्तों के रोग ,शोक ,भय ,और संताप का विनाश होता है ऐसी माँ कात्यायनी की उपासना छठे दिन की जाती है .
  7. काल से रक्षा करने वाली देवी कालरात्रि की उपासना सातवें दिन की जाती है .
  8. शांत रूप वाली ,भक्तों को अमोघ फल देने वाली देवी महागौरी की पूजा आठवें दिन की जाती है .
  9. भक्तों की  समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली देवी सिध्दात्री की पूजा नवें दिन की जाती है .
जो उपासक हवन विधि भी करना चाहते हैं वो प्रतिदिन हवन सामिग्री से हवन भी कर सकते हैं । यदि आप स्वयं हवन करना चाहें तो माता के सूक्ष्म मन्त्रों द्वारा हवन पूजन कर सकते हैं ।
यहाँ मैं उन मन्त्रों का उल्लेख कर रही हूँ ----
सर्वप्रथम हवन कुण्ड में लकड़ी रखें फिर जल से स्नान कराएं , कुमकुम लगाकर समिधा से हवन शुरू करें ।
१. ऐं ह्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नमः स्वाहा ॥
२. ऐं ह्रीं क्लीं कनकवती स्वाहा ॥
३. ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डा विच्चै  नमः स्वाहा ॥

इन मन्त्रों का ११ बार आहुति दें ,,,तदुपरांत --

१. ॐ नमः स्वाहा ॥
२. ॐ श्री सद्गुरु देवाय नमः स्वाहा ॥
३. ॐ परमब्रहाय नमः स्वाहा ॥

इन मन्त्रों का ५ बार आहुति दें ।। 

इसके बाद २४ बार गायत्री मन्त्र से आहुति देकर अंत में भोग और बलि देकर हवन की विधि समाप्त करें ,यहाँ बलि का आशय किसी जीव की बलि से बिलकुल नहीं है बल्कि आप साबुत सुपारी के द्वारा बलि दें और फिर पान खिलाकर देवी को विदा करें।  तत्पचात स्वय प्रसाद ग्रहण कर फलहार लें ।

दोस्तों मैंने अपने ब्लॉग में पहले भी माता की अर्चना पूजा बहुत विस्तार से लिखी है यदि आप सीए देखना चाहें तो कृपा करके इस लिंक को क्लिक करें ----


http://archanpuja.blogspot.in/2014/03/navratri-shubhaarmbh-31-march-2014.html


Tuesday, August 19, 2014

aja ekadashi/अजा एकादशी /21 अगस्त 2014/वीरवार


भाद्र पक्ष की कृष्ण पक्ष की एकादशी को अजा एकादशी मनाई जाती है । इस व्रत में आत्मशुद्धि तथा अध्यात्मिकता का मार्ग खुलता है ।


कथा----

  •   सूर्य वंश में राजा हरिश्चन्द्र का जन्म अयोध्या नगरी में हुआ था। राजा हरिश्चन्द्र के द्वार पट पर एक श्याम पट लगा था और जिसमें मडीयों से लिखा था ,"इस द्वार पर मुंह माँगा दान दिया जाता है ,कोई भी खाली हाथ नहीं जाता है "

    महर्षि विश्वामित्र ने पढ़ कर कहा यह लेख मिथ्या है।  राजा बोले 'आप परीक्षा कर लें महाराज "

    विश्वामित्र बोले --अपना राज्य मुझे दे दो। राजन ने कहा राज्य आपका है ,और क्या चाहिए ? 

    विश्वामित्र बोले- : दक्षिणा भी तो लेनी है "रहू ,केतु और शनि की पीड़ा भोगनी सहज है ,साढ़ेसाती का कष्ट भी सुगम है ,मेरी परीक्षा में पास होने बड़ा ही कठिन है। आपको मुर्दे जलने होंगे ,आपकी पत्नी को दासी बनना पड़ेगा। यदि आप इन कष्टों से भय नहीं तो हमारे साथ काशी चलें। 

    राजा पत्नी और पुत्र के साथ काशी गए वहां स्वयं श्मशान में डोम (शवों को जलने के लिए लकड़ी बेचने वाले ) बने ,पत्नी दासी बनी। 

    राजा के पुत्र को नाग ने डस लिया परन्तु ऐसी विपत्ति में भी राजन ने सत्य का मार्ग नहीं त्यागा। 

    परन्तु मन में शोक उत्पन्न हुआ।  उस समय गौतम ऋषि ने राजा को अजा  एकादशी का व्रत विधि पूर्वक करने को कहा।  राजा ने विधिपूर्वक अजा  एकादशी का व्रत पूजन किया और इस एकादशी के व्रत के प्रभाव से अपने पुत्र को जीवित पाया तथा पत्नी को आभूषणों से युक्त पाया।  एकादशी व्रत के प्रभाव से अनंत में स्वर्ग को प्राप्त हुए। 

    इस कथा के महात्म्य का फल अश्वमेघ यग्य के फल के सामान माना गया है। 

  • इस दिन बादाम था छुहारे का सागार लिया जाना चाहिए।