- रवि रूद्र पितामह विष्णुनुतम ,हरी चन्दन कुम कुम पंग युतम ,मुनिव्रंद गड़ेंद्र समानयुतम ,तब नौमि सरस्वती पाद्युगम ॥
- शशि शुद्ध सुधा हिमधाम युगम ,शरदाम्बबिबं समानकरम ,बहुरत्न मनोहर कांति तव नौमि सरस्वती पाद्युगम ॥
- कनकाब्ज विभूषित भूतिपदम ,भव भाव विभाषित भिन्न्पदम ,प्रभुचित्त समाहित साधुपदम ,तव नौमि सरस्वती पाद्युगम ॥
- भव सागर भंजन धातिनुतं ,प्रतिपादित सन्तति कारमिदम ,विमलादिक शुद्ध विशुद्ध पदम् ,तव नौमि सरस्वती पाद्युगम ॥
- मतिहीन जनाश्रय पादमिदम ,सकलाममभाषित भिन्न्पदम ,परिकारित विश्वमंनेकभवं ,तव नौमि सरस्वती पाद्युगम ॥
- परिपूर्णंनेकं धाम निधिम ,परमार्थ विचार विवेक निधिं ,सुरयादिक सेवित पाद्तलम तव नौमि सरस्वती पाद्युगम ॥
- सूरमौलिक गध्य्तुशि शुभ्रकरम ,विश्यादि महाभय पापहरम ,निज कान्ति विलेषित चन्द्र शिवम् ,तव नौमि सरस्वती पाद्युगम ॥
- गुण नेक कुलाषित भीतिपदम ,गुण गौरव गौर्वित सत्यपदम ,कमलोदर कोमल पादतलम ,तव नौमि सरस्वती पाद्युगम ॥
Sunday, April 28, 2013
SHREE SARSWATI STROTAM
lakshmi stuti
या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मी रूपेण संस्थिता ,नमस्तस्यें ,नमस्तस्यें ,नमस्तस्यें नमो नमः ।
१. नमस्तेस्तु महामाये श्री पाठे सुरपूजिते ,शंख्चाक्र्गादाहस्ते महालक्ष्मी नमोस्तुते ॥
२ . नमस्ते गरुर्ना रूरे कोला सुर भयंकरी ,सर्वपापहरे देवी मलाक्ष्मी नमोस्तुते ॥
३. सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्व्दुष्ट भयंकरी ,सर्वदुख हरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते ।।
४.सिद्धिः बुद्धिः प्रदे देवी भुक्तिमुक्ति प्रदायिनी ,मन्त्र पूते सदा देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते ॥
५. अध्यान्त्राहिते देवी आध्य्शक्ति महेश्वरी ,योगजे योगसम्भूते महालक्ष्मी नमोस्तुते ॥
६. स्थूल सूक्ष्म महारोद्रे महाशक्ति महोदरे ,महापापहरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते ॥
७. पद्मासंन्स्थिते देवी परब्रम्ह स्वरूपिणी ,परमेशि जगन्नमात महालक्ष्मी नमोस्तुते ॥
८. महालक्ष्म्य षट्क स्त्रोतं यः पठेभ्हक्ति मान्नर ,सर्वसिधिम वाप्नोति राज्यं प्राप्नोति सर्वदा ॥
९. श्वेताबर धरे देवी नालांकर भूषिते ,जगत्स्थिते जगन्न्मार्त महालक्ष्मी नमोस्तुते ॥
१ ० .एककाले पठेनित्यम महापाप विनाशम ,द्व्यिकालम यः पठेनित्त्यम धन्धान्न्य समन्वितः ॥
१ १ .त्रिकालं यः पठेनित्त्यम महाशत्रु विनाशनम ,महलक्ष्मीर्म वेनित्त्यम प्रसन्नाम वर्दाशुभम ॥
१. नमस्तेस्तु महामाये श्री पाठे सुरपूजिते ,शंख्चाक्र्गादाहस्ते महालक्ष्मी नमोस्तुते ॥
२ . नमस्ते गरुर्ना रूरे कोला सुर भयंकरी ,सर्वपापहरे देवी मलाक्ष्मी नमोस्तुते ॥
३. सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्व्दुष्ट भयंकरी ,सर्वदुख हरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते ।।
४.सिद्धिः बुद्धिः प्रदे देवी भुक्तिमुक्ति प्रदायिनी ,मन्त्र पूते सदा देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते ॥
५. अध्यान्त्राहिते देवी आध्य्शक्ति महेश्वरी ,योगजे योगसम्भूते महालक्ष्मी नमोस्तुते ॥
६. स्थूल सूक्ष्म महारोद्रे महाशक्ति महोदरे ,महापापहरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तुते ॥
७. पद्मासंन्स्थिते देवी परब्रम्ह स्वरूपिणी ,परमेशि जगन्नमात महालक्ष्मी नमोस्तुते ॥
८. महालक्ष्म्य षट्क स्त्रोतं यः पठेभ्हक्ति मान्नर ,सर्वसिधिम वाप्नोति राज्यं प्राप्नोति सर्वदा ॥
९. श्वेताबर धरे देवी नालांकर भूषिते ,जगत्स्थिते जगन्न्मार्त महालक्ष्मी नमोस्तुते ॥
१ ० .एककाले पठेनित्यम महापाप विनाशम ,द्व्यिकालम यः पठेनित्त्यम धन्धान्न्य समन्वितः ॥
१ १ .त्रिकालं यः पठेनित्त्यम महाशत्रु विनाशनम ,महलक्ष्मीर्म वेनित्त्यम प्रसन्नाम वर्दाशुभम ॥
माँ लक्ष्मी की स्तुति प्रति दिन प्रातः काल और सांध्य वनादाना के समय पढना विशेष फलदायी है ।
Friday, April 12, 2013
durga strot
दुर्गा स्त्रोत
- नमस्ते शरण्ये शिवे सानुकम्पे ,नमस्ते जगद व्यापिके विश्वरूपे । नमस्ते जगविंद पादारविन्दे ,नमस्ते जगतारिणी त्राहि दुर्गे । ।
- नमस्ते जगद्चिन्य मानव स्वरूपे ,नमस्ते महायोगिनी ज्ञान रूपे ।नमस्ते-नमस्ते सदानंद रूपे ,नमस्ते जगतारिणी त्राहि दुर्गे । ।
- अनाथस्य दीनस्य तृष्णा तुरस्य ,भर्यातस्य मीत्स्य बद्धस्य जन्तोः ।त्वमेका गतिर्देवि निस्तार कत्री ,नमस्ते जगतारिणी त्राहि दुर्गे ।।
- अरण्ये रणे दारुणे शत्रु मध्ये अनले ,सागरे प्रान्तरे राजगेहे । त्वमेका गतिर्देवि निस्तार नौका ,नमस्ते जगतारिणी त्राहि दुर्गे । ।
- अपारे महादुस्त्रे अत्यंत घोरे ,विपत्सागरे भज्ज्ताम देह्भाजम । त्वमेका गतिर्देवि निस्तार हेतुः नमस्ते जगतारिणी त्राहि दुर्गे । ।
- नम्श्चन्दिके चंड - दुर्दंड लीला ,समुत्खंडिता शेष रात्रों त्वमेका । त्वमेका गतिर्देवि निस्तार बीजं ,नमस्ते जगतारिणी त्राहि दुर्गे । ।
- त्वमे वाधमा वाध्रता सत्यवादिनी ,जात्जिता क्रोध्नात क्रोधनिष्ठा । इडा पिंगला त्वं सुषुम्ना च नाड़ी ,नमस्ते जगतारिणी त्राहि दुर्गे । ।
- नमोः देवी दुर्गेः शिवे भीमनादे ,सरस्व्त्स्य रुन्धत्य मोघ्स्वरूपे । विभूतिः शची कालरातिः सतीत्वम ।नमस्ते जगतारिणी त्राहि दुर्गे । ।
- शरण मयि सुराणाम सिद्धि विद्धया धरानाम ,मुनिः मनुज पसॊनाम द्स्याभिस्त्रानाम । नृपति गृह गतानाम व्याधिभिः पीडिता नाम , त्वमसि शरण मेका देवी दुर्गे प्रसीद । ।
maa ki sankshipt upaasna
- देवी प्रप्न्नाति हरे प्रसीद प्रसीद मार्त जगतो अखिलस्य ,प्रसीद विश्वेश्वरी पाहि विश्वं त्वमीश्वरी चराचरस्य .
- सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ,शरण्ये त्रयम्बिके नारायणी नमोस्तुते ।
- देवी त्वं भक्तसुलभे सर्वकार्य विधायिनी ,कलोहि कार्य सिद्धर्थ्य मुयाम ब्रूह यत्नतः .
- ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा , बलादा कृष्य मोहाय महामाया प्रयक्षति ।
- दुर्गे स्मरता हरसि भीतिमशेष जन्तोः ,स्वस्थे स्मरता मतिमतीव शुभां ददासि ।
- दारिद्य दुःख भय हारिणी का त्वन्द्या ,सर्वोपकार करनाय सदार्द चिता । शरणागत दीनार्त परित्राण परायने ,सर्व्स्यार्ति हरे नारायणी नमोस्तुते ।
- सर्वस्वरूपे सेर्वेषे सर्वशक्ति समन्विते ,भयेभ्यस्त्राहि नो देवी दुर्गे नमॉस्तुते ।
- रोगान शेशान पहन्सि तुष्टा ,रुष्टा तू कामान सक्लांभिशितान । त्वं आश्रीतानाम न विपिन्नरानाम ,त्व्माश्रिता ह्याश्रिता प्रयन्ति '
- सर्वबाधा प्रस्मनम त्रैलोकश्य अखिलेश्वरी ,एवमेव त्वया कार्यमस्द्वैरी .विनाशं ।
Thursday, April 11, 2013
KEELAK STROT
कीलक स्त्रोत ----
महर्षि मार्कण्डेय जी बोले -----
कल्याण प्राप्ति हेतु निर्मल ज्ञानरूपी शरीर धारण करने वाले दिव्य नेत्रों वाले ,तथा मस्तक पर अर्धचन्द्र धारण करने वाले भगवन शिव जी! को नमस्कार है
,इस धरा पर जो मनुष्य इस कीलक मन्त्र को जानने वाला है वाही कल्याण को प्राप्त करता है । जो केवल सप्तशती से ही देवी की स्तुति करता है उसे इस कीलक से देवी की सिद्धि हो जाती है ।देवि की सिद्धि के लिए दूसरी साधना की आवश्यकता नहीं रह जाती ,लोगों के मन में आशंका थी की केवल सप्तशती के मन्त्रों की उपासना अथवा अन्य मन्त्रों की उपासना से भी सामान रूप से सब कार्य सफल हो जाते हैं तो इनमें से कौन सा साधन श्रेष्ठ है ।
इन सभी शंकाओं को लेकर भगवन शंकर ने अपने सामने आये भक्तों को समझते हुए कहा---- सप्तशती नामक सम्पूर्ण स्त्रोत कल्याण को देने वाला है और तभी भगवन शंकर ने माँ के सप्तशती नामक स्त्रोत को गुप्त कर दिया । इसलिए मनुष्य इसको बड़े पुण्य से प्राप्त करता है ।
जो भी मनुष्य अष्टमी को या कृष्ण पक्ष की चतुर्दसी को देवी को अपना सर्वस्व समर्पित कने के पश्चात् उसे प्रसाद रूप में ग्रहण करता है ,उस पर माँ दुर्गा प्रसन्न हो जाती हैं,अन्यथा नहीं । इस प्रकार शिव जी द्वारा इस स्त्रोत को कीलित किया गया है ,और जो पुरुष इस स्त्रोत को निश्कीलित करके नित्य प्रति पाठ करता है ,वह सिद्ध हो जाता है और वही गंधर्व होता है ।
इस संसार में सर्वत्र विचरते हुए भी उस मनुष्य को भय नहीं रहता म्रत्यु के पश्चात मोक्ष प्राप्त करता है । किन्तु इस कीलक की विधि को जानकार ही सप्तसती का पाठ करना चाहिए । कीलन और निष्कीलन के ज्ञान के पश्चात यह स्त्रोत निर्दोष हो जाता है । ऐसा कहा जाता है , की स्त्रियों में जो सौभाग्यहैं ,इसी पाठ की कृपा स्वरूप हैं ।
इस स्त्रोत का पाठ उच्च स्वर में करने से ही की जानी चाहिए । उस देवी की स्तुति अवश्य की जानी चाहिए जिसके प्रसाद स्वरूप सौभाग्य ,आरोग्य ,सम्पत्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है ।
Wednesday, April 10, 2013
ARGLA STROT
नवरात्री में दुर्गा सप्सती के पाठ का विशेष विधान है और साथ कहा जाता है की अर्गला स्त्रोत और कीलक का पाठ भी करना चाहिए -------अर्गला स्त्रोत -------------
जयंती ,मंगला ,काली ,भद्रकाली,कपालिनी ,दुर्गा ,क्षमा ,शिव,धात्री स्वाहा ,स्वधा इन रूपों में प्रसिद्ध माँ तुमको नमस्कार है ..- सब जगह व्याप्त प्राणियों के दुःख हरने वाली माँ !कालरात्रि तुम्हें नमस्कार है ,मधुकैटभ का नाश करने वाली माँ ब्रह्मा जी को वर देने वाली माँ तुम मुझे रूप दो जय दो और काम क्रोध रुपी शत्रुओं का नाश करने वाली माँ तुमको मेरा नमस्कार है .।
- महिषासुर मर्दिनी माँ! भक्तों को सुख देने वाली तुमको नमस्कार हो ,तुम मुझे रूप दो के दो और मेरे शत्रुओं का नाश करो .।
- रक्तबीज का वध करने वाली ,माँ !चंड मुंड विनाशिनी ,तुम मुझे रूप,जय दो और मेरे शत्रुओं का नाश करो .।
- शुम्भ-निशुम्भ का मर्दन करने वाली हे देवी! मुझको स्वरूप दो ,जय दो और मेरे काम,क्रोध रुपी शत्रुओं का नाश करो .।
- हे सम्पूर्ण सोभाग्य को देने वाली !,पूजित युगल चरणों वाली माँ तुम मुझे रूप दो ,यश दो ,मेरे शत्रुओं का नाश करो ।
- तुम सब शत्रुओं का नाश करने वाली! हो ,तुम्हारे रूप और चरित्र अमित हैं ,मुझे रूप दो ,यश दो और काम क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो ।
- इस संसार में जो भक्ति से तुम्हारी पूजा करते हैं सबके पापों का नाश करने वाली माँ !तुम उन सबको रूप और यश दो और उनके शत्रुओं का नाश करो ।
- माँ रोगों का नाश करने वाली जो भी भक्त तुम्हारी पूजा भक्ति पूर्वक करते हैं उनको रूप और जय दो ,उनके शत्रुओं का नाश करो ।
- हे देवी! माँ मुझे सोभाग्य और आरोग्य दो मुझे रूप दो जय दो और मेरे काम,क्रोध रुपी शत्रुओं का नाश करो ।
- हे माँ ! जो मुझसे बैर रखते हैं उनका नाश करके मेरा बल बढाओ ,मुझे रूप,जय दो मेरे शत्रुओं का नाश करो ।
- माँ! मेरा कल्याण करके मुझे उत्तम सम्पत्ते प्रदान करो ,मुझे रूप दो जय दो और मेरे शत्रुओं का नाश करो ।
- देवताओ और राक्षसों के मुकुटों द्वारा स्पर्श किये चरणों वाली माँ !अम्बे मुझे स्वरूप ,जय दो ।
- हे देवी! अपने भक्तों को विद्वान ,लक्ष्मीवान और कीर्तिमान बनाकर उन्हें रूप और जय दो ,उनके शत्रुओं का नाश करें ।
- हे देवी ! प्रचंड दैत्यों के मान का नाश करने वाली चण्डिके !मुझे रूप दो जय दो ,और मेरे काम क्रोध रुपी शत्रुओं का नाश करो .
- हे माँ ! चार भुजाओं वाली परमेश्वरी !मुझे रूप ,जय दो मेरे शत्रुओं का नाश करो ।
- विष्णु से सदा स्तुति की हुई माँ ! हिमालय कन्या पारवती के भगवान् शंकर से स्तुति की गयी माँ ,मुझे रूप दो जय दो ,और मेरे शत्रुओं का नाश करो ।
- इंद्र द्वारा सद्भाव से पूजित माँ! तुम मुझे रूप दो जय दो और मेरे काम क्रोध रुपी शत्रुओं का नाश करो ।
- प्रचंड ,भभुदंड से दैत्यों का दमन करने वाली माँ !मुझे रूप दो ,यश दो ,मेरे शत्रुओं का नाश करो ।
- हे देवी! तुम अपने भक्तों को असीम आनंद देने वाली हो ,मुझे रूप ,जय दो और मेरे शत्रुओं का नाश करो
- मेरी इच्छानुसार चलने वाली सुंदर पत्नी प्रदान करो ,माँ ! जो संसार सागर से तारने वाली हो और उत्तम कुल में उत्पन्न हुई हो .
जो मनुष्य इस महा स्त्रोत का पाठ करता है वह श्रेष्ठ फल प्राप्त करता है और प्रचुर धन भी प्राप्त करता है .
Tuesday, April 9, 2013
shinghvahni maa durga ki stuti
हे सिंघ्वहिनी जगदम्बे तेरा ही एक सहारा है --------
- मेरी विपदाएं दूर करो ,करुणा की द्रष्टि इस ओर करो । संकट के बीच घिरा हूँ माँ आशा से तुम्हें पुकारा है .
- कुमकुम ,अक्षत और पुष्पों से नैवेध धूप और अर्चन से । नित तुम्हें रिझाया करती हूँ क्यों अब तक नहीं निहारा है .
- जब-जब मानव पर कष्ट पड़े तब-तब तुमने अवतार लिया । हे कल्याणी ! हे रुद्राणी ,इन्द्राणी रूप तुम्हारा है .
- भाव -बाधाएं हरने वाली जन-जन की बाधाएं हरती हो । मेरी भी बाधाएं हरना जग जननी नाम तुम्हारा है .
- कौमारी ,सरस्वती हो तुम ,ब्रम्हाणी तुम वैष्णवी हो ।कर शंख चक्र और पुष्प लिए लक्ष्मी भी रूप तुम्हारा है .
- मधुकैटभ सा दानव मारा और चंड मुंड को चूर किया ।हे महेश्वरी ,महामाया चामुंडा रूप तुम्हारा है .
- धूम्रलोचन को तुमने मारा ,महिषासुर तुमने संहारा है । हे सिंघ्वाहिनी !अष्टभुजी नवदुर्गा रूप रुम्हारा है .
- था शुम्भ-निशुम्भ असुर मारा और रक्तबीज का रक्त पिया । हे शिवदूती! हे गौरी माँ काली भी रूप तुम्हारा है .
- जब वैश्य -सुरथ ने तप करके अपना तन तुम्हें चढ़ाया था । दर्शन दे जीवनदान दिया ज्योतिर्मय रूप तुम्हारा है .
- तेरी शरणागत में आकर तेरी ही महिमा को गाकर ।माँ ! सप्तशती के मन्त्रों से भक्तों ने तुहें पुकारा है .
हे सिंघ्वाहिनी जगदम्बे तेरा ही एक सहारा है ---------------------
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